भारत और सर्वाइकल कैंसर : अज्ञात कड़ी
January 29, 2020 • Akram Choudhary

 

दिल्ली(अमनइंडिया):सर्वाइकलकैंसर, स्तन कैंसर के बाद भारतीय महिलाओं को होने वाला दूसरे सबसे आम कैंसर है। आंकड़ों से पता चलता है कि हर साल सर्वाइकल कैंसर के 96,922 मामले सामने आते हैं और सर्वाइकल कैंसर से हर 8 मिनट में एक महिला की मौत होती है। सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) होता है।भारत में 1 फीसदी से भी कम महिलाओं को एचपीवी से बचाव का टीका लगाया जाता है। ये इंजेक्शन 16 साल की उम्र से पहले लगाया जाना बहुत जरूरी है। 45 करोड़ 30 लाख से अधिक लड़कियों को इस उम्र तक ये इंजेक्शन नहीं लगाया जाता और उन्हें सर्वाइकल कैंसर होने का खतरा रहता है। इन महिलाओं में केवल 5 फीसदी महिलाएं ही अपने जीवन में एक बार सर्वाइकल कैंसर की जांच कराती हैं। जांच न कराने का मतलब है  कि भारत में 85 फीसदी महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर का निदान बाद के स्टेज में होता है। इसकी तुलना में अमेरिका और ब्रिटेन में बाद के स्टेज केसर्वाइकल कैंसर के निदान के केवल 20 फीसदी मामले ही मिलते हैं।

इस स्थिति में भारत में सभी तरह के कैंसर से पीड़ित महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर से दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा महिलाओं की मौत होती है। यह विश्व में सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौत में 25 फीसदी का योगदान देता है। हालांकि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने दिखाया है कि राष्ट्रीय टीकाकरण और जांच कार्यक्रमों से वह अगले 20 साल में सर्वाइकल कैंसर के पूर्ण रूप से खात्मे की दिशा में काम करने में जुटे हैं। ब्रिटेन में इस तरह के जांच कार्यक्रमों के कारण सर्वाइकल कैंसर के 92 फीसदी मरीजों के जीवित रहने की दर पांच साल बढ़ गई है। यह सब कैंसर की नियमित जांच से ही संभव हो पाया है। संक्षेप में कहने का मतलब यह है कि सर्वाइकल कैंसर से बचाव किया जा सकता है और गैरजरूरी रूप से होने वाली मौतों की संख्या घटाई जा सकती है। भारत में सर्वाइकल कैंसर से बचाव के उपाय समय से अपनानेजैसे ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचवीपी) का इंजेक्शन लगवाने और सर्वाइकल कैंसर की जांच सबको उपलब्‍ध कराकर लोगों की सेहत की सबसे बड़ी चिंता सर्वाइकल कैंसर को जड़ से मिटाया जा सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी स्थिति की गंभीरता को समझा है और 2030 तक सर्वाइकल कैंसर से बचाव के महत्वपूर्ण उपाय अपनाने के लिए प्रस्तावित लक्ष्य तय किए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 15 वर्ष की उम्र तक 90 फीसदी लड़कियों में पूरी तरह से टीकाकरण हो जाना चाहिए। 35 से 45 साल की उम्र की 70 फीसदी महिलाओं की जांच बेहद सटीक ढंग से की जाए। सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित 90 फीसदी महिलाओं का उचित ढंग से इलाज किया जाए।

एचपीवी टेस्टिंग एक ऐसा टेस्ट हैजो काफी संवेदनशील है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से बेहतर संसाधनों वाले क्षेत्र में यह टेस्ट कराने की सिफारिश की जाती हैजबकि पैप स्मियर टेस्ट कम संवेदनशील होता है। इसकी कम लागत के कारण इस टेस्ट की सिफारिश सीमित आर्थिक संसाधनों वाले क्षेत्र में की जाती है। डीएनए पर आधारित एचपीवी टेस्ट उन महिलाओं की पहचान करता है,जिन्हें भविष्य में सर्वाइकल संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसमें सबसे बड़ी बाधा यह है कि यह टेस्ट काफी महंगा है। इसे ज्यादा से ज्यादा सस्ता किया जाना चाहिएताकि भारत में कैंसर से पीड़ित महिलाओं को उसी तरह की बेहतरीन देखभाल मिल सकेजैसे विकसित देशों में मिलती है।