फोर्टिस 'कॉन्‍वेलेसेंट प्लाज़्मा थेरेपी' के ज़रिए नोएडा के कोविड-19 लोगों के लिए लेकर आया है उम्मीद
July 9, 2020 • Akram Choudhary

फोर्टिस 'कॉन्‍वेलेसेंट प्लाज़्मा थेरेपी' के ज़रिए नोएडा के कोविड-19 लोगों के लिए लेकर आया है उम्मीद

डॉक्टर्स डे के अवसर पर एक सीनियर सिटीज़न को दी गई थी नोएडा में पहली सीपीटी

 

नोएडा(अमन इंडिया)। इस साल फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के लिए डॉक्टर्स डे बिलकुल अलग था। नोएडा में पहली बार फोर्टिस हॉस्पिटल में एक कोविड-19 से संक्रमित 63-वर्षीय रोगी को कॉन्‍वेलेसेंट प्लाज़्मा थेरेपी (सीपीटी) दी गई। थेरेपी के बाद रोगी ने ठीक होने के सकारात्मक संकेत दिए हैं। फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के डिपार्टमेंट ऑफ पल्मोनोलॉजी ऐंड क्रिटिकल केयर के डायरेक्टर व हैड डॉ. मृणाल सरकार और उनकी टीम ने यह थेरेपी की।

प्लाज़्मा एक पारदर्शी लिक्विड होता है जो रक्त से लाल व सफेद रक्त कोशिकाएं व प्लेटलेट्स मिलने के बाद बचता है। कॉन्‍वेलेसेंट प्लाज़्मा थेरेपी सीपीटी में कोविड-19 रोग से ग्रस्‍त मरीज़ के स्‍वस्‍थ होने के बाद उसके शरीर से लेकर उसे कोरोना वायरस संक्रमित रोगी के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है जिससे उसका शरीर संक्रमण से लड़ सके। इसे मध्यम दर्जे के कोविड-19 संक्रमित उन रोगियों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है जिनका ऑक्सीजन स्तर घटता है। मौजूदा महामारी की परिस्थितियों को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसे अभी कोविड-19 रोगियों के इलाज में इन्वेस्टिगेशनल थेरेपी के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति दी है।

फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के डिपार्टमेंट ऑफ पल्मोनोलॉजी ऐंड क्रिटिकल केयर के डायरेक्टर व हैड डॉ. मृणाल सरकार ने बताया, ''रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) के ज़रिए कोविड-19 की पुष्टि होने वाले ऐसे रोगी जिनकी उम्र 18 साल से अधिक है और उनका ऑक्सीजन का स्तर घट रहा है वे कॉन्‍वेलेसेंट प्लाज़्मा थेरेपी के लिए उपयुक्त हैं विशेष रूप से लक्षण दिखने के 1 सप्ताह के भीतर। हालांकि, यह डोनर प्लाज़्मा मैच होने पर निर्भर करता है। हालांकि, ऐसे रो​गी जो ब्लड प्रोडक्टस को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, जिन्हें पिछले 30 दिन में इम्युनोग्लोब्यूलिन/प्लाज़्मा इन्फ्यूज़ंस दिए गए हैं, सांस लेने से संबंधित गंभीर बीमारियों (ARDS) व सदमे से पीड़ित रोगी और इंसिफैलोपैथी, रीनल फेल्यर से पीड़ित ऐसे रोगी जिनमें पहले ही क्लीनिकल स्तर पर ब्लड प्रोडक्ट्स इंफ्यूज़ किए जा रहे हैं को सीपीटी नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन प्लाज़्मा ट्रांसफ्यूज़न से संबंधित प्रतिकूल प्रभाव गैर-जानलेवा हैं और उनका इलाज संभव है।'

डीजीएचएस को लेकर जारी भारत सरकार की अधिसूचना के अनसुार, कॉन्‍वेलेसेंट प्लाज़्मा थेरेपी को कोविड—19 उपयोग में 'ऑफ लेबल' बताया गया है। फिलहाल, अभी कोविड-19 के गंभीर संक्रमण से पीड़ित रोगियों के लिए कोई निर्धारित थेरेपी विकल्प नहीं है। लेकिन 27 रोगियों पर 5 स्वतंत्र अध्ययनों से जुटाए गए क्लीनिकल डेटा के आधर पर एंटीवायरल/एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के साथ सीपीटी एक प्रभावी थेरेपी विकल्प हो सकता है और इसमें सुरक्षा, क्लीनिकल लक्षणों में सुधार और मृत्यु दर में गिरावट देखने को मिल सकती है। 

हाल में खाद्य एवं दवा प्रशासन के सुझावों के अनुसार, इन्वेस्टीगेशनल कॉन्‍वेलेसेंट प्लाज़्मा थेरेपी देने और उसके अध्ययन से सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा के दौरान कोविड-19 रोगियों के इलाज में उसके क्लीनिकल प्रभाव का पता चल सकता है।”

फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के ब्लड बैंक की डायरेक्टर डॉ. सीमा सिन्हा ने बताया, ''एक संभावित डोनर की उम्र 18 साल से कम होनी चाहिए, पुरुष या कभी गर्भवती नहीं हुई महिला हो सकती है जिसका वज़न 55 किलोग्राम से कम हो। प्लाज़्मा डोनेट करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि डोनर का आरटी-पीसीआर से कोविड-19 टेस्ट हुआ हो और उसके बुखार, खांसी जैसे लक्षण कम-से-कम 28 दिन पहले खत्म हो चुके हों या फिर कम से कम 14 दिन पहले से उसे ऐसे कोई लक्षण नहीं हो और 24-24 घंटे के अंतराल पर लिए गए दो नेसोफैरिंजियल स्वॉब का कोविड-19 टेस्ट नेगेटिव आया हो। इसके अतिरिक्त, डोनर को ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स ऐक्ट, 1940 और 1945 (मार्च 2020 तक किए गए संशोधनों के साथ) के तहत उन सभी पात्रता मानकों का पालन करना होगा जो रक्तदान के दौरान होता है।''